Select Page

हरिद्वार की चौहद्दी पर जंगलों के पीछे सूरज डूबने वाला है. पिछली रात हुई बारिश ने गर्मी की इस शाम को सुहाना बना दिया है. देश के सबसे ज्यादा चाकचौबंद आश्रमों में से एक के भीतर—जहां हर बार परिसर में प्रवेश पर आपको सीआरपीएफ की सुरक्षा जांच से गुजरना होता है—पसरे सन्नाटे को एक बगीचे के बीच में लगे फव्वारे और अंग्रेजी के एम अक्षर के आकार के एक बरामदे में लगे झूले की आवाज रह-रहकर तोड़ती है. गोधूलि की केसरिया पृष्ठभूमि में एक भगवाधारी योगी इस झूले पर बैठा है. उसकी आंखें बंद हैं, गोया वह ध्यान लगाकर एक ऐसे सहज और स्वाभाविक सवाल का जवाब तलाशने में जुटा हो, जो शायद उसके लिए काफी जटिल हैः आखिर एक स्वयंभू योगी शैम्पू, टूथपेस्ट, डिटर्जेंट और जवान बनाए रखने वाली क्रीम क्यों बेच रहा है?जब वह आंखें खोलता है तो उसकी तिरछी मुस्कान और आंखों की शरारती चमक अचानक गायब हो जाती है. योग, सत्संग, आयुर्वेद, कारोबार और राजनीति के अजीबोगरीब और अपरिचित मिश्रण वाले देश के सबसे लोकप्रिय योग गुरु 48 वर्षीय बाबा रामदेव कहते हैं, ”मैं जब युवावस्था में हिमालय गया तो ऐसे कई साधुओं को देखा जिन्होंने भौतिक जीवन को त्याग दिया था. आखिर वे कर क्या रहे थे? मानव मात्र के कल्याण के लिए कुछ नहीं. जीवन का उद्देश्य यह तो नहीं हो सकता. भारत में यह माना जाता है कि साधु कुछ भी करने में अयोग्य होता है. मान्यता है कि वह भिक्षा पर जीता है. इसने मुझे चोट पहुंचाई. एक साधु का असली उद्देश्य अपने लिए मोक्ष हासिल करना नहीं है, बल्कि जनता की सेवा करना है. मेरा कारोबार मुनाफा कमाने के लिए नहीं है, कल्याण का प्रसार करने के लिए है.”

भारत के सामाजिक क्षितिज पर मौजूद तमाम गुरुओं में रामदेव इसीलिए अलग नहीं हैं क्योंकि उनका विशाल एफएमसीजी कारोबारी साम्राज्य 5,000 करोड़ रु. के कांटे को छू गया है, बल्कि इसलिए क्योंकि उनका एक राजनैतिक रुझान भी है जो बिल्कुल साफ है. माना जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी तक उनकी सीधी पहुंच है, वे केंद्रीय कैबिनेट के कई सदस्यों के काफी करीब हैं और कई मुख्यमंत्रियों के साथ भी उनके रिश्ते अच्छे हैं. वे 2011 के लोकपाल आंदोलन का एक अहम चेहरा थे. तत्कालीन यूपीए सरकार जब लोकपाल आंदोलन के नेता अण्णा हजारे के साथ सौदेबाजी की कोशिश में थी तो रामदेव को एयरपोर्ट पर लेने खुद तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी गए थे. रामलीला मैदान से सलवार कमीज पहनकर भागने की कोशिश में वे हास्यास्पद भी हो गए थे, जब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. वे कर प्रणाली को एकल विनिमय कर में तब्दील करने के समर्थक हैं. उन्होंने काला धन वापस लाने की मुहिम शुरू की, जो 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार में बीजेपी का एक अहम वादा साबित हुआ. आज वे मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के एक मजबूत सहयोगी की तरह खड़े नजर आते हैं. कथित असहिष्णुता के खिलाफ सरकारी पुरस्कार लौटाने वालों पर तो उन्होंने कोई हमला नहीं किया, लेकिन उन लोगों का वध कर देने की धमकी जरूर दे डाली जो ”भारत माता की जय” बोलने से इनकार करते हैं. पंजाब में नशीले पदार्थों के दुरुपयोग से लेकर एक दंपती के बीच संबंध की आध्यात्मिक सेहत तक, समलैंगिकता की कथित भयावहता (जिसका ”इलाज” करने में वे सहयोग दे सकते हैं) से लेकर देसी माल खरीदने की अहमियत तक इस गुरु के विमर्शों का दायरा सार्वभौमिक है.

पिछले एक साल से उनका कारोबारी साम्राज्य 100 फीसदी से ज्यादा की दर से वृद्धि कर रहा है. वे अकेले कारोबारी नहीं हैं जिसने वृद्धि के लिए राजनैतिक संपर्कों को भुनाया है. न ही वे पहले आध्यात्मिक गुरु हैं, जिनका राजनैतिक संपर्कों का दायरा है. उन्हें एक बात जो अद्भुत बनाती है, वह यह है कि उन्होंने सभी तीन तत्वों- आध्यात्मिकता, कारोबार और राजनीति का बड़ी सहजता से मेलजोल कर डाला है. उनका राजनैतिक रसूख इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि अध्यात्म और योग के क्षेत्र में उन्हें महारत हासिल है. यह राजनैतिक दायरा बदले में उनके कारोबारी साम्राज्य के विस्तार का बायस बनता है. रामदेव आज टीवी पर देश के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले गुरु हैं और उनके पास एफएमसीजी उत्पादों की ऐसी शृंखला है, जो सीधे उन्हें जनता के साथ जोड़ती है. जो इसके सहारे लोगों के दिलो-दिमाग से लेकर वोट और त्वचा के रंग तक को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं.

पैकेज गुरु
रामदेव की ”कल्याण” की परिभाषा पर विवाद हो सकता है, लेकिन जीवनशैली से जुड़ी तमाम दिक्कतों के लिए योग और आयुर्वेद के मिश्रित पैकेज से 30 मिनट का झटपट नुस्खा बेचने की उनकी काबिलियत ने उन्हें भारतीय आध्यात्मिकता—रूहानी और जिस्मानी दोनोंकृके झंडाबरदार में तब्दील कर डाला है. वे कहते हैं, ”मुझसे पहले भी योग गुरु हुए हैं, लेकिन मैंने योगाभ्यास को एक औसत आदमी के लिए कुछ साधारण चरणों में बदल डाला, जिसके पास योग करने का वक्त नहीं होता.”

उन्होंने इतना ही नहीं किया. करीब दस लाख सक्रिय अनुयायियों और आस्था चैनल पर रोजाना उन्हें देखने वाले हजारों लोगों के अलावा 2009 में बनाई कंपनी पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के माध्यम से उपभोक्ता सामान के क्षेत्र में उनके प्रवेश ने हिंदुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड (एचयूएल), नेस्ले और डाबर जैसी स्थापित कंपनियों के बीच खलबली मचा दी. रामदेव के खुदरा माल के जखीरे में करीब 350 उत्पाद मौजूद हैं, जिनमें शैम्पू, टूथपेस्ट, घी, डिटर्जेंट, बिस्कुट, अनाज और दवाएं शामिल हैं. ये उत्पाद उपभोक्ता सामान के बाजार में स्थापित मानकों को चुनौती दे रहे हैं क्योंकि स्वदेशी के विचार में इन्होंने आध्यात्मिकता की छौंक लगा दी है.

पतंजलि आयुर्वेद का कारोबार 2012 में 450 करोड़ रु. था, जो मार्च 2016 में 5,000 करोड़ रु. को छू गया है. चार साल से कम की अवधि में यह ग्यारह गुना वृद्धि है. पिछले एक साल में बिक्री दोगुने से भी ज्यादा हुई है, जबकि उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी एचयूएल की बिक्री महज चार फीसदी बढ़ी है. सिगरेट को छोड़कर आइटीसी की एमएमसीजी श्रेणी में 2014-15 के बीच 7.7 फीसदी की वृद्धि हुई है. इंडिया इन्फोलाइन फाइनेंस लिमिटेड (आइआइएफएल) इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज रिपोर्ट कहती है कि पतंजलि ने पांच फीसदी से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी अपने कब्जे में कर ली है और उसका अनुमान है कि 2020 तक यह हिस्सेदारी 13 फीसदी हो जाएगी.

रामदेव ने अब अगले 10 साल में एक लाख करोड़ रु. की बिक्री का लक्ष्य रखा है—यह देश के समूचे पैकेटबंद उपभोक्ता उत्पाद बाजार के मौजूदा आकार का एक-तिहाई है. फिक्की और परामर्श फर्म केपीएमजी की सितंबर, 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के पैकेटबंद उपभोक्ता उत्पाद बाजार का आकार अनुमानतः 3.2 लाख करोड़ रु. सालाना है. सौ साल पुरानी कंपनी एचयूएल ने इस मार्च में 32,482 करोड़ रु. की शुद्ध बिक्री दर्ज की थी. इंडिया इन्फोलाइन की एक हालिया रपट के मुताबिक, पतंजलि का उभार कम से कम 13 सूचीबद्ध कंपनियों पर असर डालेगा और आइआइएफएल का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2020 तक उसका 11 फीसदी टर्नओवर अकेले एचयूएल को नुक्सान पहुंचाकर आएगा.

यह असर प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की वित्तीय रिपोर्टों में साफ झलक रहा है. टूथपेस्ट निर्माता कोलगेट जिसकी बाजार हिस्सेदारी करीब 57 फीसदी है, उसकी बिक्री की वृद्धि दर 2005 से 2015 के बीच लगातार दो अंकों में रही है लेकिन वित्त वर्ष 2015-16 के आरंभिक नौ महीनों में वह गिरकर 3.7 फीसदी पर आ गई जब पतंजलि ने अपना उत्पाद दंत कांति बाजार में उतारा. पतंजलि के प्रभाव को लेकर धारणा ऐसी है कि जब नेस्ले के मैगी नूडल्स को इस आरोप के आधार पर प्रतिबंधित किया गया कि उसमें सीसा और मोनोसोडियम ग्लूटामेट की मात्रा अत्यधिक है तो अटकलें लगाई गईं कि ऐसा इसलिए किया जा रहा था, ताकि पतंजलि के आटा नूडल्स की बाजार में राह आसान की जा सके.

स्वदेशी जागरण मंच रामदेव को नायक के रूप में देखता है. मंच के एस. गुरुमूर्ति कहते हैं, ”उन्होंने खेल के नियम ही बदल डाले हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी अनुकरण करने को बाध्य कर रहे हैं. कोलगेट का विज्ञापन अब अपने टूथपेस्ट में नीम और नमक की बात करता है.”

रामदेव अपने उत्पादों का विपणन विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर हमले के रूप में करते हैं जिनके बारे में उनका कहना है कि ये कंपनियां ”भारतीय ग्राहकों को लूटने” के लिए आई हैं. ”मैं एमएनसी को शीर्षासन करा दूंगा”, ऐसा कहकर वे भारतीयता के गौरव की अपील जगाते हैं. कंपनियों द्वारा लूटने की दलील के समर्थन में वे अपने उत्पादों का दाम प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले काफी कम रखते हैं. उनके उत्पादों की लागत कम क्यों है, रामदेव इसके चार कारण गिनाते हैं, ”हमारे यहां ऐसे एग्जीक्यूटिव नहीं हैं जो अपना 90 फीसदी वक्त कॉन्फ्रेंस कॉल और प्रेजेंटेशन देने में बिताते हों. हमारे खरीद विभाग में ईमानदार लोग हैं. हमने अपना वितरण नेटवर्क अपने फ्लैगशिप स्टोरों तक ही सीमित रखा है. और हम विज्ञापन पर बहुत व्यय नहीं करते क्योंकि मैं मुक्रत का ब्रांड एंबेसडर हूं.” रामदेव के करीबी सहयोगी, पतंजलि आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण के मुताबिक, कंपनी 8 से 10 फीसदी मुनाफे पर काम करती है. पतंजलि आयुर्वेद कॉर्पोरेट इकाई है जबकि उनकी अन्य पहलें जैसे कि अस्पताल, योग केंद्र और स्कूल वगैरह का प्रबंधन धर्मार्थ पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट करता है, जिसे रामदेव और बालकृष्ण चलाते हैं.

उन्होंने 27 अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, ”अब तक कोलगेट का तो गेट खुल गया, नेस्ले का तो पंछी उड़ने वाला है, पैंटीन का तो पैंट गीला होने वाला है और दो साल में यूनीलीवर का लीवर खराब हो जाएगा.” बाद में हालांकि उन्होंने इंडिया टुडे को बताया, ”वे पंक्तियां उत्साह में कही गई थीं. मेरा लक्ष्य किसी को नुक्सान पहुंचाना नहीं है. मैं अपनी लकीर लंबी खींचना चाहता हूं, न कि किसी की लकीर छोटी करना चाहता हूं. इस चुनौती से सतर्क हो जाना चाहिए ताकि वे ग्राहकों को धोखा न दे सकें और उत्पादों की कीमत ज्यादा न रखें.”

ब्रांड एंबेसडर
पतंजलि के साम्राज्य में देर से ही सही लेकिन चीजें अब बदल रही हैं. उसके उत्पाद अब तक करीब 10,000 चिकित्सालयों और आरोग्य केंद्रों पर बेचे जा रहे थे, जिन्हें कोई थर्ड पार्टी एक्सक्लूसिव पतंजलि स्टोर के नाम से चलाती थी. इसने अब वितरण के लिए अपोलो फार्मेसी, फ्यूचर समूह और रिलायंस रीटेल के साथ समझौता कर लिया है. जो कंपनी पहले जबानी प्रचार और अपने विशिष्ट वितरण चैनलों पर निर्भर थी, उसने अब परंपरागत विज्ञापन और वितरण के तरीकों को अपना लिया है. टीवी के दर्शकों की माप करने वाली एजेंसी ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) इंडिया के अनुसार नवंबर, 2015 में अपना विज्ञापन शुरू करने वाली कंपनी पतंजलि ने जनवरी और मार्च के बीच कुल 12 में से नौ हफ्तों में विज्ञापनों की साप्ताहिक सूची में शीर्ष स्थान हासिल किया. टीवी पर उसके साप्ताहिक विज्ञापनों की संख्या जनवरी के पहले सप्ताह में 11,897 से 102 फीसदी बढ़कर 25 मार्च को खत्म हुए सप्ताह में 24,050 पर पहुंच गई. इसी अवधि में रामदेव सभी टीवी चैनलों पर 2,34,934 बार दिखाई दिए जिसका मतलब यह है कि वे हर 30 सेकंड में किसी न किसी चैनल पर दिख रहे थे.

कारोबारी स्रोतों का अनुमान है कि समूह ने विज्ञापन पर करीब 400 करोड़ रु. खर्च किए, लेकिन रामदेव का कहना है कि यह आंकड़ा 60 करोड़ से भी कम था. रामदेव के साथ 1987 से जुड़े रहे बालकृष्ण कहते हैं, ”हम लोग कड़ा मोलभाव करते हैं.” रामदेव पतंजलि का चेहरा हैं तो बालकृष्ण उसके पीछे के योजनाकार और संचालक. मूल नेपाली नागरिक और बाद में रहने के लिए भारत चले आए दंपती सुमित्रा देवी और जय वल्लभ के यहां जन्मे बालकृष्ण सुवेदी हरियाणा के खानपुर गुरुकुल में रामदेव के कनिष्ठ थे. उनके पास पतंजलि आयुर्वेद के 94 फीसदी शेयर हैं और वे कई अन्य कंपनियों के प्रबंध निदेशक हैं. वे पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति हैं तथा कई अन्य ट्रस्टों व संस्थानों के भी प्रमुख हैं. रामदेव के साथ मिलकर वे हरेक उत्पाद के विकास पर निगरानी रखते हैं और आखिरी डिजाइन पैकिंग को भी मंजूरी देते हैं. प्रसिद्ध डिजाइनर इतु चौधरी ने हाल ही में टिप्पणी की थी कि पतंजलि की ”बेजान” डिजाइनिंग वास्तव में उसकी मदद करती है. चैधरी ने लिखा था, ”यह पतंजलि को एक ”ग्रामीण” छवि देती है. इससे जो अर्थ निकलते हैं, वे शुद्धता की ओर इशारा करते हैं और यही उसके घी के ”सच्चे” स्वाद व टूथपेस्ट के असर के लिए जिम्मेदार है.”

एफएमसीजी की इस कामयाब कहानी के तीसरे स्तंभ हैं रामदेव के संकोची छोटे भाई राम भरत, जो तस्वीर खिंचवाने से बचते हैं और साक्षात्कार देने से इनकार कर देते हैं. 38 वर्षीय राम भरत हरिद्वार में पतंजलि योग पीठ के रोजमर्रा के काम देखते हैं. योग पीठ की शुरुआत 2006 में 1,000 एकड़ में हुई थी. इसके भीतर आज पतंजलि आयुर्वेद का कारखाना चलता है. यहां एक शोध केंद्र है, घी बनाने वाली इकाई है, एक विश्वविद्यालय है, एक स्कूल, दो गुरुकुल, एक गोशाला, एक भारत माता नमन स्थल स्मारिका, एक फूड पार्क समेत एक परीक्षण प्रयोगशाला भी स्थित है. यहां शीर्ष प्रबंधकों समेत करीब 15,000 लोग रोजगाररत हैं. रामदेव कहते हैं, ”हमने समूची जमीन लोगों से बाजार दाम पर खरीदी है. उत्तराखंड सरकार ने हमें कोई जमीन नहीं दी है. आप रिकॉर्ड जांच सकते हैं.”

योग पीठ के भीतर 350 शोध छात्र काम करते हैं जिनमें करीब सौ पीएचडी डिग्रीधारक हैं. वे हर्बल औषधि से लेकर योग और प्राचीन ग्रंथों से लेकर कुदरती सौंदर्य प्रसाधनों, घरेलू सामान व प्राकृतिक चिकित्सा जैसे विविध क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. इन्हें 30,000 रु. से 3.5 लाख रु. के बीच मासिक वेतन मिलता है.

हरिद्वार में पांच अन्य कारखानों, मध्य प्रदेश में तीन और राजस्थान में तीन कारखानों के बावजूद रामदेव के कारोबारी साम्राज्य का केंद्र उनका फूड पार्क है जहां शोधकर्ताओं और प्रबंधकों की एक कोर टीम अगले उत्पाद के विकास की योजनाएं बनाती है. उत्पादन इकाई में उप-महाप्रबंधक 52 वर्षीय आर.एस. शुक्ला हमें पावर वीटे की एक बोतल दिखाते हैं, जिसे अभी लॉन्च किया जाना है. यह बोर्नविटा और हॉर्लिक्स का प्रतिद्वंद्वी उत्पाद होगा. वे इसमें शामिल सात पौधों के नाम गिनवाते हैं जिनके बारे में उनका दावा है कि इनसे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और दिमाग तेज होता है. रसायनशास्त्र में स्नातकोत्तर शुक्ल समूह के एक्सट्रैक्शन डिविजन का काम देखते हैं.

लगातार उभार
रामदेव का जन्म हरियाणा के सैदालीपुर गांव में किसान रामनिवास यादव और उनकी पत्नी गुलाबो देवी के घर में हुआ था. उनका नाम रामकिशन रखा गया था. बचपन में रामकिशन को फालिज का दौरा पड़ा, जिससे उसके चेहरे का बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया. 1977 में उन्होंने एक साधु से एक किताब लेकर योगाभ्यास शुरू कर दिया जिसके बारे में उनका कहना है कि उससे वे बिल्कुल ठीक हो गए, बस बाईं आंख गड़बड़ रह गई. कहानी यह है कि योग से प्रेरित होकर वे मोक्ष की तलाश में हिमालय चले गए और गंगोत्री के करीब तीन साल बिताए. ”मैं जब हिमालय गया, उस वन्न्त मैं अपने बारे में सोच रहा था. वहां मुझे अपने लक्ष्य का ज्ञान हुआ. यह कि अपने मोक्ष की तलाश करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उद्देश्य व्यापक कल्याण होना चाहिए.”

वे 1993 में रामदेव के रूप में हरिद्वार लौटे और गंगा किनारे दो छात्रों को योग सिखाने लगे. इनमें से एक ने उन्हें गुजराती व्यवसायी जिवराज भाई पटेल से मिलवाया, जो उन्हें सूरत ले गया. वहां 200 लोगों के साथ रामदेव ने पहला योग शिविर लगाया. बाद में वे देश के दूसरे हिस्सों में ऐसे ही योग शिविर लगाने लगे. अगले साल दिल्ली के उनके एक योग शिविर आयोजक राम निवास गर्ग ने रामदेव को 50,000 रु. दिए ताकि वे मलेरिया और असम के कुछ हिस्सों में फैले कालाजार के उपचार के लिए आयुर्वेदिक दवाएं बना सकें. रामदेव कहते हैं, ”तब पहली बार हमने दवाएं बनाईं और उन्हें लेकर असम के डिब्रूगढ़ व उदलगुड़ी गए.” बालकृष्ण बताते हैं कि उदलगुड़ी में कैसे उन्हें ईसाई मिशनरियों का विरोध झेलना पड़ा, जो उनकी मंशा पर संदेह कर रहे थे. बालकृष्ण कहते हैं, ”लेकिन उस इलाके में सक्रिय बोडो आतंकियों ने यह समझा कि हम लोग गरीबों की मदद कर रहे हैं और हमारा कोई धार्मिक एजेंडा नहीं है. अंत में उग्रवादियों का एक समूह हमसे मिला और हमारे काम की तारीफ  की.” दो दशक बाद रामदेव को चिरांग में 750 एकड़ भूमि आवंटित कर दी गई है. यह बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया के जिलों में एक है. यहां वे स्कूल और गौशाला खोलेंगे, जिसमें गायों और मिथुन बैलों की संकर प्रजाति पैदा करने की योजना बनाई गई है.

जिवराज पटेल द्वारा 1995 में मिले 3.5 लाख रु. और अन्य ”चाहने वालों” से मिले 1.5 लाख रु. के अनुदान से रामदेव और बालकृष्ण ने हरिद्वार के कनखल में आयुर्वेदिक अस्पताल और शोध केंद्र दिव्य फार्मेसी का आरंभ किया. रामदेव बताते हैं कि अहम मौका 2001 में आया जब वे संस्कार चैनल पर 20 मिनट के एक योग कार्यक्रम में सुबह 6.45 पर आने लगे, जिसमें वे खुले बदन अपनी देह को तोड़ते-मरोड़ते थे. इस शो से उन्हें तत्काल राष्ट्रीय लोकप्रियता हासिल हुई और देश भर में लोग उन्हें पहचानने लगे. तीन साल बाद उन्होंने और ज्यादा लोकप्रिय चैनल आस्था पर अपना प्रोग्राम शुरू किया, जिसमें उनके योग सत्र का सीधा प्रसारण किया जाता था. आज आस्था चैनल पर रामदेव के सहयोगियों का तकरीबन पूरा नियंत्रण है जबकि संस्कार में पतंजलि की अहम हिस्सेदारी है.

रामदेव ने 2002 में दिल्ली, सूरत, अहमदाबाद और पटना में चार अस्पताल खोले. तीन साल बाद उनका सामना अपने करियर के पहले सबसे बड़े विवाद से हुआ, जब सीपीएम की नेता बृंदा करात ने दिव्य फार्मेसी की कुछ आयुर्वेदिक औषधियों में इनसान और पशुओं की हड्डियों का चूरा मिला होने का आरोप लगाया. दो अलग-अलग प्रयोगशालाओं से प्राप्त विरोधी नतीजों के बाद यह विवाद अपनी मौत मर गया.

मिस्टर भारत  
रामदेव की जिंदगी में एक बड़ा मौका तब आया जब आठवीं कक्षा में उन्हें दयानंद सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश हाथ लगी और जैसा कि वे कहते हैं, उसके माध्यम से उन्हें ”स्वदेशी गौरव” की अवधारणा का पहली बार ज्ञान हुआ—ऐसी अवधारणा जो उनकी सामाजिक-राजनैतिक यात्रा के अधिकांश को परिभाषित करती है. रामदेव कहते हैं, ”दयानंद सरस्वती ने अंग्रेजों द्वारा भारत पर लादी गई मैकाले की शिक्षा का विरोध किया था. मैंने इसीलिए सरकारी स्कूल को छोड़ दिया, हालांकि मैं कक्षा में अव्वल आता था.” रामदेव ने खानपुर के गुरुकुल में नाम लिखवाया और आचार्य प्रद्युमन के अंतर्गत पाणिनि के व्याकरण, उपनिषद् और वेदों की शिक्षा ली.

रामदेव के शिक्षा दर्शन के मूल में स्वदेशी गौरव है, लेकिन वे अंग्रेजी सीखने का विरोध नहीं करते. बालकृष्ण के साथ संस्कृत में फोन पर हो रहे एक संवाद को तोड़ते हुए बीच में वे कहते हैं, ”मैं खुद बेहतर अंग्रेजी बोलना सीख रहा हूं क्योंकि वैश्विक मंच पर यह जरूरी है.” वे खुद को गुजराती, मराठी और बांग्ला जैसी कई भारतीय भाषाओं में सिद्धहस्त बताते हैं.

वे बड़े गर्व से योग पीठ के भीतर स्थित सीबीएसई मान्यता प्राप्त स्कूल आचार्यकुलम् की कक्षाएं दिखाते हैं, जहां छात्रों का एक समूह भारत माता की प्रतिमा के पास एक ऊंचे मंच पर खड़े होकर गायत्री मंत्र पढ़ रहा है. दूसरे कमरे में बंगाल से आया एक शिक्षक सातवें दर्जे के बच्चों को अंग्रेजी सिखा रहा है तो लड़कियों का एक समूह कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सीखने में जुटा है. इस बीच योग गुरु कुछ छात्रों के साथ बैडमिंटन भी खेल लेते हैं. वे बताते हैं, ”हमारा स्कूल प्राचीन भारतीय शिक्षण पद्धति को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ता है. यह मस्तिष्क, शरीर और आत्मा के लिए दी जाने वाली शिक्षा है, जो छात्रों को सक्षम और नैतिक बनना सिखाती है.” बालकृष्ण के अनुसार आचार्यकुलम् की शाखाएं खोलने के लिए 400 आवेदन उनके दफ्तर में पड़े हैं. इन आवेदनों में 2 एकड़ से लेकर 25 एकड़ तक भूमि दान करने का प्रस्ताव भी शामिल है.

रामदेव का बड़ा सपना हालांकि सीबीएसई की तर्ज पर एक वैदिक शिक्षा बोर्ड गठित करने का है, जो मई में खटाई में पड़ गया था जब पूर्व मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने उसके प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. इस मामले में प्रधानमंत्री हस्तक्षेप कर सकते हैं, इसका संकेत देते हुए वे कहते हैं, ”आखिरी फैसला तो शीर्ष स्तर पर ही होता है. मैं आश्वस्त हूं कि कुछ महीनों में सकारात्मक निर्णय ले लिया जाएगा.” हाल ही में कैबिनेट में हुए फेरबदल में ईरानी को कपड़ा मंत्रालय थमा दिया गया है.
योग पीठ के परिसर में पहले से ही दो गुरुकुल हैं—एक लड़कों और दूसरा लड़कियों के लिए—जिनमें 300 छात्रों को वैदिक पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है. रामदेव कहते हैं, ”मुझे अपनी विरासत की चिंता नहीं है. मैंने और आचार्य बालकृष्ण ने जो काम किया है, उसे आगे बढ़ाने के लिए 300 के इस समूह में से कोई चुन ही लिया जाएगा.”

राजनैतिक शख्स
 रामदेव ने 2007 में जब पतंजलि योग पीठ का आरंभ किया था तो आयोजन में 15 मुख्यमंत्री आए थे. इसके बावजूद असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने जब पिछली मई में अपने शपथ ग्रहण समारोह में आने के लिए रामदेव को न्यौता भेजा तो उन्होंने विनम्रता से उसे ठुकरा दिया. वे कहते हैं, ”मैं सैद्धांतिक रूप से राजनैतिक आयोजनों से दूर रहता हूं.” राजनीति से दूर रहने का सार्वजनिक रूप से विज्ञापित उनका पक्ष शायद इस तथ्य के चलते है कि योग और कॉर्पोरेट उद्यमों के उलट उनके राजनैतिक प्रयास मोटे तौर पर नाकाम रहे हैं और कई मौकों पर इससे उनकी विश्वसनीयता को आंच ही पहुंची है. हालांकि दिल्ली के रामलीला मैदान में उनका आंदोलन बाद में खत्म हो गया लेकिन माना जाता है कि सरकार उनकी लोकप्रियता से सहमी हुई थी. वे कहते हैं, ”मैंने जब अपना राजनैतिक अभियान शुरू किया था तब मुझे अपनी प्रतिष्ठा की चिंता नहीं थी. मैंने उसे समाज के कल्याण के लिए किया था.”

उनकी राजनैतिक मुहिम मोटे तौर पर तीन मूल मुद्दों के इर्दगिर्द केंद्रित रही है-स्वदेशी, भ्रष्टाचार और काला धन. एक विवादास्पद और रहस्यमय शख्स राजीव दीक्षित के साथ मिलकर 2009 में रामदेव ने भारत स्वाभिमान आंदोलन शुरू किया था—”भारत के गौरव को बहाल करने की एक राष्ट्रीय मुहिम.” इसका शुरुआती निशाना बनी बहुराष्ट्रीय और शीतल पेय कंपनियां, जिनकी तुलना टॉयलेट क्लीनर से की गई. रामदेव ने 2010 में ऐलान किया कि आंदोलन को एक राजनैतिक पार्टी में बदला जाएगा और वे आम चुनाव में सभी 543 सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे. दीक्षित की छत्तीसगढ़ के भिलाई में नवंबर, 2010 में अचानक हुई मौत ने इस सपने का अंत कर दिया. रामदेव ने 2012 में कहा कि दीक्षित की मौत के साथ उनका नाम जोडऩे की साजिश रची गई है.

रामदेव ने 4 जून, 2011 से रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह शुरू करने से पहले अण्णा हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन को समर्थन दिया. बाबा जब दिल्ली पहुंचे, तो प्रणब मुखर्जी समेत यूपीए सरकार के चार कैबिनेट मंत्री उन्हें मनाने के लिए उनसे मिलने हवाई अड्डे पर पहुंचे. एक दिन बाद सरकार ने अपना दिमाग बदला और आधी रात को आंदोलनकारियों पर पुलिस ने हमला बोल दिया, जिनमें अधिकतर लोग भारत स्वाभिमान आंदोलन के सदस्य थे. रामदेव को गिरफ्तार करके हरिद्वार वापस भेज दिया गया, जहां उन्होंने आमरण अनशन शुरू कर दिया. कमजोरी और खराब सेहत के चलते उन्होंने चार दिन में ही अनशन और आंदोलन दोनों को खत्म कर दिया.

रामदेव ने 2014 के आम चुनाव से पहले काले धन का मुद्दा उठा दिया. इसके समर्थन में उनके पास जेएनयू के प्रोफेसर अरुण कुमार की एक शोध रिपोर्ट तथा ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल व ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी के पर्चे थे. काला धन बीजेपी के प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेंद्र मोदी का पसंदीदा चुनावी जुमला था. रामदेव ने मोदी को समर्थन दिया और चार मौकों पर उनकी चुनावी रैलियों का हिस्सा बने. अर्थशास्त्री जोसेफ  स्टिगलिट्ज और राजनीतिविज्ञानी नियाल फर्ग्यूसन और चाणक्य के अर्थशास्त्र से उद्धरण देना उन्हें पसंद आता है. वे कहते हैं, ”मैंने काले धन की मात्रा का अनुमान हवा में नहीं लगाया था. मैंने घंटों कुमार जैसे अर्थशास्त्रियों के साथ चर्चा की थी, रिपोर्टें पढ़ी थीं और फिर न्यूनतम संभव राशि का हवाला दिया था.”

कहते हैं कि प्रधानमंत्री पर रामदेव का अच्छा-खासा प्रभाव है. फरवरी, 2015 में मोदी ने ऐलान किया था कि योग से जुड़े धमार्थ ट्रस्टों से होने वाली आय को सेवा कर से रियायत दी जाएगी. इसका श्रेय रामदेव को दिया जाता है.

बीजेपी के 2014 में केंद्र की सत्ता में और बाद में कुछ राज्यों की सत्ता में आते ही रामदेव पर सम्मानों की झड़ी लग गई है. महाराष्ट्र सरकार ने पतंजलि योग पीठ को 600 एकड़ जमीन संतरा प्रसंस्करण संयंत्र व आयुर्वेदिक उत्पादों की इकाइयां लगाने के लिए दे दी है. इस क्षेत्र में पतंजलि अपने प्रस्तावित उद्यमों में 2,000 करोड़ रु. से ज्यादा का निवेश करेगी. महाराष्ट्र सरकार के साथ यह सौदा पटाने में अहम भूमिका निभाने वाले केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने तो अंदमान में रामदेव को एक द्वीप का ही प्रस्ताव दे डाला ताकि वहां एक योग रिसॉर्ट की स्थापना की जा सके. हरियाण सरकार ने उन्हें अप्रैल में राज्य का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त कर दिया. राज्य सरकार ने उन्हें कैबिनेट रैंक की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया लेकिन राज्य में 10,000 योग केंद्र खोलने पर वे राजी हो गए. राज्य सरकार ने एक विश्वविद्यालय और एक स्कूल स्थापित करने के लिए उन्हें पहले ही 20 एकड़ जमीन दे रखी है. अगस्त में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने घोषणा की कि वह पतंजलि के हर्बल सप्लीमेंट और खाद्य उत्पादों के विपणन के लिए योगपीठ के साथ समझौता करेगा. आदिवासी मामलों के मंत्री जुएल ओरांव ने कहा है कि वे कुपोषण का अंत करने के लिए रामदेव के साथ गठजोड़ करेंगे. अक्तूबर, 2014 में गृह मंत्रालय ने रामदेव को जेड श्रेणी की सुरक्षा प्रदान कर डाली.

पसारे अपने पंख
ये सारे कदम मिलकर उन झटकों की भरपाई कर देते हैं जो रामदेव ने कांग्रेस की अगुआई में यूपीए की सरकार के हाथों, ”सहे” हैं. इसी फरवरी में हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट को सोलन जिले के साधुपुल में लीज पर दी गई 28 एकड़ जमीन का आवंटन अनियमितताओं का हवाला देते हुए रद्द कर दिया. 2010 में बीजेपी की सरकार ने यह जमीन पतंजलि योगपीठ को 17 लाख रु. के भुगतान और 1 रु. की सालाना टोकन फीस पर 99 साल की लीज पर दी थी. बालकृष्ण कहते हैं, ”यह सियासी साजिश है.” 2009 में एक एनआरआइ दंपती ने रामदेव को स्कॉटलैंड के नजदीक 900 एकड़ का एक द्वीप, जिसे अब पीस आइलैंड कहा जाता है, ”तोहफे” में दिया था. यूपीए की हुकूमत के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने मामला दर्ज करके इस लेनदेन में विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून के उल्लंघन की संभावना की जांच बैठा दी थी.

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद निदेशालय ने इस मामले को बंद कर दिया. बालकृष्ण के खिलाफ धन शोधन का एक और मामला विचाराधीन था, जो उनके विदेशी ट्रस्टों के लेनदेन से जुड़ा था. इसे भी अक्तूबर, 2014 में बंद कर दिया गया. दो महीने बाद सीबीआइ ने पतंजलि योगपीठ से रामदेव के गुरु शंकर देव के 2007 में गायब होने के मामले में भी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की.

योग गुरु कहते हैं, ”मेरा कारोबार कामयाब है मगर मैं अरबपति नहीं होना चाहता.” वे आगे कहते हैं, ”मेरे कारोबार का मकसद कल्याण के काम करना है. महात्मा गांधी के बताए गए ट्रस्टीशिप का भी यही विजन है.” बच्चों के लिए तमाम उत्पादों पर चर्चा के लिए उनकी बैठकें तय हैं. इन उत्पादों को शिशु केयर कहा जाएगा और योग गुरु को उम्मीद है कि इस बार शीर्षासन जॉनसन ऐंड जॉनसन कंपनी कर रही होगी.