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श्रावण मास का धार्मिक और ज्योतिषीय जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। श्रावण भगवान शिव को बेहद ही प्रिय है। माना जाता है कि श्रावण मास में शिविलंग पर जल समर्पित करने से श्रद्धालु की सभी मनोकामनाऐं पूर्ण हो जाती हैं और उसके समस्त पापों का नाश होता है। इतना ही नहीं उसे शिवलोक की प्राप्ति भी होती है। इस वर्ष श्रावण जिसे सावन भी कहा जाता है अंग्रेजी पंचांग या कैलेंडर की 20 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है। श्रावण मास में शिव मंदिरों में श्रद्धालु उमड़ते हैं इतना ही नहीं बारह ज्योर्तिलिंगों में शिव आराधना का दौर होता है।

सुबह से रात्रि पट बंद होने तक श्रद्धालु शिव आराधना करते हैं। श्रद्धालुओं के पांव शिवधाम की ओर बढ़ते हुए थकते भी नहीं। इतना ही नहीं हर कहीं बम बोल की गूंज सुनाई देती है। श्री शिव का जलाभिषेक करने के लिए कावड़िए मीलों पैदल चलकर आते हैं और पुण्य कमाते हैं। भोले की इन नगरियों में से एक नगरी उज्जैन भी श्रावण मास में शिव आराधना से गूंजती है। इस नगरी में श्रावण मास में रात ठहरती ही नहीं ।

अर्थात् श्रद्धालु इतने उल्लासित होते हैं कि श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर के आसपास इस मास में रात्रि 1.30 बजे भी चहलपहल रहती है। यही नहीं भगवान श्री महाकालेश्वर की भस्म आरती में तो ऐसा लगता है जैसे साक्षात् भगवान से ही श्रद्धालुओं का साक्षात्कार हो गया है। मंदिर में श्रद्धालु उमड़ते रहते हैं। श्रावण के मास में प्रति सोमवार और भाद्रपद मास के सोमवार श्री महाकालेश्वर राजसी ठाठबाट के साथ चांदी की पालकी में विभिन्न स्वरूपों में विराजित होकर शिप्रा तट के लिए निकलते हैं।

इस दौरान श्री महाकालेश्वर की नगरी में एक अलग ही उल्लास होता है। शिव की आराधना में कोई मांस, मदिरा का सेवन छोड़ देता है तो कोई आराधना के बाद छककर भांग पीता है। कोई बिना जूते और चप्पल पहने ही भ्रमण करता है तो कोई दाढ़ी और बाल नहीं कटवाता। ऐसे में श्रावण मास में एकासना व्रत रखने का भी लोग विधान अपनाते हैं। पूरे मास शिव की आराधना की जाती है। भगवान शिव श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं और श्रद्धालुओं को शिव लोक की प्राप्ति होती है।